अधूरा प्रेम

एक लड़की थी — **स्वामिनी**… जो **जीवन** नाम के लड़के को जानती भी नहीं थी। और जीवन भी स्वामिनी को नहीं जानता था। फिर भी… किसी अनकहे मोड़ पर, किसी अनदेखी राह में, दो अनजान दिलों की प्रेम कहानी जुड़ गई। ना मुलाक़ात हुई थी, ना बातें लंबी चली थीं… बस एहसास थे, जो शब्दों से पहले पहुँच गए। कभी एक नाम से धड़कन तेज़ हो जाती, तो कभी एक खामोशी में पूरा दिन मुस्कुरा उठता। ये प्रेम था… जो जान-पहचान का मोहताज नहीं होता, जो पहचान से पहले दिल में घर बना लेता है। सिर्फ़ एक फेसबुक लाइक से शुरू हुई ये पहचान… एक-दूसरे के दिल में कब उतर गई, ख़ुद उन्हें भी पता नहीं चला। फिर धीरे-धीरे बातें लंबी होने लगीं… मैसेज से कॉल तक, कॉल से इंतज़ार तक। दिन की शुरुआत उसी नाम से होती, और रात उसी ख़्याल पर थम जाती। दोनों में कुछ तो था— जो कहा नहीं जाता था, पर हर बात में महसूस होता था। दो अनजान लोग, अब अजनबी नहीं रहे थे… और ये एहसास चुपचाप प्रेम बनता जा रहा था। फिर एक दिन… जीवन ने साँसें थामकर, दिल की धड़कनों को काबू में रखकर, स्वामिनी से कह ही दी अपने मन की बात। उस पल स्वामिनी थोड़ी स्तब्ध रह गई। क्योंकि उसके दिल में जीवन सिर्फ़ एक अच्छे दोस्त का ही स्थान रखता था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये सब अचानक क्या हो रहा है। कई दिन यूँ ही खामोशी में बीत गए। लेकिन वक़्त के साथ, उसके दिल के किसी कोने में जीवन के लिए धीरे-धीरे प्यार जागने लगा। भावनाओं के फूल खिलने लगे… और आख़िरकार वो उसके प्यार के आगे हार गई। और यूँ ही अपना दिल जीवन को सौंप बैठी। समय के साथ दोनों का प्यार और गहराता चला गया… प्यार भरी बातें, एक-दूसरे की चाहत, दिनोदिन बढ़ती ही चली गई। पर… एक दिन वो ख़बर आ गई— स्वामिनी की शादी किसी और लड़के के साथ तय हो गई। माँ-बाप के लाड़-प्यार में पली स्वामिनी उनके फैसले का सम्मान करना जानती थी। उसने अपने प्यार को कुर्बान कर दिया… और सिर्फ़ माँ-बाप की इज़्ज़त के खातिर किसी और के साथ सात फेरे ले लिए। लेकिन उसका मन… अब भी जीवन में ही उलझा हुआ था। दिन बीते, हफ्ते गुज़रे, महीने और फिर साल। उसे पति भी अच्छा मिला— बेहतर समझने वाला, बेहतर चाहने वाला, बेहतर प्यार देने वाला। उधर कुछ साल बाद जीवन की भी शादी हो गई। उसे भी एक अच्छी जीवनसाथी मिली। आज दोनों अपने-अपने परिवारों में खुश हैं। फिर भी… कभी-कभी जीवन को लगता है कि ज़िंदगी में कुछ तो खो गया है। और वो उसे ढूँढने लगता है… जानते हो वो क्या ढूँढता है? अपनी खोई हुई प्रेमिका को नहीं— बल्कि उन पलों को, उस मासूम प्यार को, जो अधूरा रह गया। अब वो सिर्फ़ बीते पलों की यादों में सुकून ढूँढ लेता है… और उसी राहत में खुश रहने की कोशिश करता है। --- **लेखक का संदेश** सिर्फ़ पाना ही प्यार नहीं होता। किसी का सम्मान रखना भी प्यार होता है— विशेषकर अपने जन्मदाताओं के सम्मान के आगे। अगर उनके मान-सम्मान के लिए कुछ कुर्बान करना पड़े, तो बेझिझक कीजिए… क्योंकि उससे बड़ा प्यार दुनिया में कहीं भी नहीं होता।

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